हर रोज़ की तरह आज भी वैसी ही सुबह हुई। चिल्लाती हुई। चलो सच बताता हूँ।
तरा ला ला ला ला ला ला
तरा रम पम पम!
आज देखि मैंने इक अनोखी दास्ताँ। अपनी इन्ही आंखों से। क्या वो इक सोच थी?या कोई जगता हुआ सपना?
क्या वो इक सच्चाई थी? या एक झूठ?
या वो इन चेहरों की तरह एक और चल्ती-फिरती कब्र थी?
एक दास्ताँ है वो। क्या कमाल की दास्ताँ! हाहा!
देखि हुइ दास्ताँ सुनना चाहते हो?
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Saturday, June 21, 2008
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